पुण्य, पद्य का पाथेय हैं, सुख नहीं - श्रमणाचार्य श्री विमर्शसागरजी
•जिनागम पंथ जयवंत हो जो सच्चे सुख का मार्ग प्रशस्त करता है। संसार में • हर जीव सुख चाहता है। पर सच्चे सुख का बोध न होने के कारण क्षणिक सुख को सुख मान बैठता है। संसार में सभी प्रकार की अनुकूलताये अगर प्राप्त हो जाये तो जीव अपने आप की सुखी मानने लगता है, लेकिन का नाम सुख नहीं है, क्योंकि अनुकूलताय पुण्य से प्राप्त होती हैं और पुण्य आत्मा का स्वभाव नहीं है। जो अनुकूलता को सुख मान रहा है। के स्वभाव भाव नहीं हैं, पुण्य-पाप तो कर्म हैं। और कर्म ही संसार का जनक हैं। अनुकूलताओं में सुख की मान्यता नहीं अनुकूलता में सच्चे सुख की खोज करना चाहिये । पृथिक को अगर मार्ग संबंधी अनुकूलतायें मिल जाये तो मार्ग सहजता से पार हो जाता है। कोई पथिक जब कहीं जाता है तो अपने साथ पथिय (नास्ता), लेकर जाता है ताकि रास्ते में कोई परेशानी न हो। वह पाथेय सिर्फ मार्ग की अनुकूलता है, मंजिल नहीं वरन इसी प्रकार मोक्षमार्ग के पथिक अपने साथ पुण्य का पाथेय लेकर चलते हैं पर वो जानते हैं कि यह पुण्य रूपी पाथेय मात्र मार्ग की अनुकूलता के लिये है ये अनुकूलता, ये मेरी मंजिल नहीं हैं। अनुकूलता मात्र पाथेय है सुख नहीं | उक्त उद्गार परम पूज्यनीय भावलुिंगी संत श्रमणाचार्य श्री - विमर्श सागर जी महामुनिराज ने धर्म सभा के दौरान व्यक्त किये। पूज्य गुरुदेव ने आगे कहा कि संसार में जीव के भटकने का कारण क्षणिक सुख में सूच्चे सुख भी भ्रान्ति हैं। जबतक क्षणिक सुख एवं शाश्वत सुख में भेद मालूम नहीं पडेगा तब तक जीव इस सगिक सुख में ही भ्रमता और रमता रहेगा। जब जीव को क्षणिक सुख भी दुख रूप प्रतिभासित होता है तब वह सच्चे देवशास्त्र गुरु जसे श्रेष्ठ निमितों की शरण में जाता है। क्योंकि दुख के समय ही प्रभु और गुरु नजर आते ।जब व्यक्ति धूप से संक्लेशित होता है तभी वो वृक्ष की शरण में जाता है यद्यपि वृक्ष तो सतत खडे है छाया देने के लिये पर जब तक धूप की तपन भीतर कष्ट पैदा नहीं करती तब तक छाया की शरण अच्छी नहीं लगती। ऐसे ही जिसे संसार में सभी अनुभूति होती हैं।वही संसार से छूटने के पुरुषार्थ करता हैं, अतः पूज्यवर ने कहा कि संसारी रहो, शुख से रहो पर सच्चे सुख और क्षणिक सुख में भेद डाल कर रक्खो।।
रिपोर्ट-अनुज कुमार जैन

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