भावलिंगी संत राष्ट्र योगी श्रमणाचार्य श्री विमर्श सागर जी महामुनिराज ने कहा भौतिक सुखों की रुचि दुःख रूप गहन अंधकार को लाने वाली है
महमूदाबाद सीतापुर
जब मन शान्ति की तलाश करता है, सुख की खोज करता है, आनंद की भावना करता है तब सद्गुरु ही शरण रूप से श्रद्धा में आते हैं। जब हमारे जीवन में श्रद्धा का विकास होता है तो स्वयं ही हम उस सुख-शांति आनंद रूप तत्त्व को उपलब्ध होने लग जाते हैं जहाँ हमारी श्रद्धा रुचि होती हैं वहीं सुख शांति आनंद की अनुभूति होती है। पदार्थ चाहे श्रेष्ठ हो अथवा तुच्छ वहाँ पदार्थ मायने नहीं रखता वहाँ आपकी श्रद्धा आपकी रुचि मायने रखती है। माँ अपने बालक को लेकर किसी कार्यक्रम में गयी, अपने बालक को पास में बैठाकर किसी कार्य में लग गई बालक खेलते 2 माँ से दूर हो गया, जब उसे ध्यान आया कि माँ आस-पास नहीं दिख रही है तो वह उस कार्यक्रम के बीच में अपनी माँ को खोजता है वहाँ अन्य भी मातायें हैं बालक सभी को देखता है लेकिन ठहरता किसी के भी पास नहीं । जबकि अन्य मातायें उसकी अपनी माता से अधिक सुंदर है, सुंदर आभूषण पहने हैं, बालक को दुबार भी देती हैं, फिर भी वह बालक और उसका मन कहीं भी नहीं ठहरता । जैसे ही बालक को अपनी माता की एक झलक दिखलाई पड़ती है बालक अपनी माँ की ओर दौड़ पड़ता है और माँ से लिपट जाता है, एकमेक सा हो जाता है। ऐसा क्यों हुआ ? क्योंकि बालक की रुचि अपनी ही माँ में है भले ही उसकी माँ एक सामान्य महिला हो । कहने का तात्पर्य हैं कि हम सुख शान्ति-आनंद की खोज तो करना चाहते हैं लेकिन हम अपनी रुचि को नहीं पहिचानते जब तक हमें अपनी कचि से परिचय नहीं होगा तब तक हम अपने को इस जगत में दौड़ाते ही रहेंगें किन्तु अपने सुख शांति आनंद को प्राप्त नहीं हो सकते ।
सद्गुरु कहते हैं- अपनी रुचि को पहिचानो और उस वस्तु में अपनी रुचि जागृत करो जो आपको सुख शांति आनंद की अनुभूति कराए | जैसी रुचि आप सांसारिक - भौतिक पदार्थों में अपनी रुचि पैदा करते हैं वैसी ही रुचि पारमार्थिक कार्यों में भी आना चाहिए । भौतिक सुखों को भोगने के बाद दुःखों की काली रात्रि का आना निश्चित हैं ऐसी ही नियति है इसे कोई अन्यथा नहीं कर सकता। हाँ कुछ समय के लिए ऐसा प्रतिभास होता है कि मुझे सुख-शांति मिल रही है लेकिन यह भी समझना चाहिए - भौतिक सुखों को भोगते हुए दुःख की गहन राति आने वाली हैं अत: हमें भी कचि को पहिचान कर अपनी रुचि वहाँ जागृत करना चाहिए जहाँ हमें वास्तविक शाश्वत सुख शांति आनंद की प्राप्ति होते !
ज्ञान रुचि का पिछलग्गु है :- ज्ञान रुचि का अनुशरण करता है हमारी जैसी रुचि अर्थात जैसा श्रदान होगा वैसा ही ज्ञान कहलाता है यहां सम्यक् है तो ज्ञान भी सम्यग्ज्ञान होगा और यदि श्रद्धा मिथ्या है तो ज्ञान भी मिथ्याज्ञान होगा। जैसी रुचि और ज्ञान होगा आपका आचरण भी उसी के अनुसार बन जाता है । आप अपने भविष्य को सुखरूप भी बना सकते हैं और दुःख रूप भी यह पूर्णतः निर्भर करता है आपके रुचि ज्ञान और आचरण पर । आपकी रुचि ज्ञान और आचरण कैसा है ? भौतिक अथवा पारमार्थिक !
रिपोर्ट-अनुज कुमार जैन

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