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सीतापुर: गुरुपथ अनुगामी ही सदृशिष्य | भावनिंगीसंत श्रमताचार्य श्री विमर्शसागर जी महामुनिराज

गुरुपथ अनुगामी ही सदृशिष्य | भावनिंगीसंत श्रमताचार्य श्री विमर्शसागर जी महामुनिराज

महमूदाबाद, सीतापुर



वर्तमान संत संस्था  में परम पूज्य भावलिंगी संत श्रमणाचार्य श्री विमर्शसागर जी महामुनिराज एक ऐसे श्रेष्ठ संत हैं जिनके पास ज्ञान संस्कार अनुशासन और मर्यादा की चर्चा एवं चर्चा देखने सुनने को मिलती है। कम बोलना लेकिन काम का बोलना पू. आचार्य श्री की अपनी विशिष्ट शैली है प्रवचनों मे सकारात्मक और आत्म हितकारी चिंतन परोसने वाले हित-मित्र-प्रिय भाषी पूज्य श्रमणाचार्य श्री ने अनादि अनिधन जिनागम पंथ का सूत्र देकर जैन एकता के लिए सफल और सुदृढ़ प्रयास किया है। आज पूज्य आचार्य श्री में अपने प्रवचनों में कहा



कल्याण पथ के पथिक, परम वीतरागी दिगम्बर संत स्वयं आत्म उद्धार करते हुए जगत का उद्धार करने के लिए बिहार करते हैं। ऐसे निर्धन्य गुरु का दश मात्र ही भव्य जीवों के लिए आत्म-शान्ति और दुर्गति निवारण में कारण जन जाता है। आज तक जिन जीवों को भी आत्म सुख की प्राप्ति हुई है उनकी प्रथम शरण



निर्ग्रन्थ वीतरागी गुरु ही रहे हैं !

■ अनादि से यह जीव स्वयं ही अज्ञानता के कारण ही दुखी रहा है और स्वयं ही अज्ञानता को दूर करने वाला है। किन्तु ज्ञान क्या है?, अज्ञान क्या है? धर्म-अधर्म क्या है ?, पुण्य पाप क्या है ? इसका ज्ञान कराने वाले दिगम्बर मुद्रा धारी वीतरागी निर्ग्रन्थ शुरू ही हुआ करते हैं।


सद्गुरू कहते हैं- भी जीव तू स्वयं अपनी ही अज्ञानता के कारण दुखी है, सद्‌गु की शरण प्राप्त करके अपनी अज्ञानता दूर कर, तू स्वयं सुखी हो जाएगा!


कोई दूसरा आपको सुखी नहीं बना सकता, आपको स्वयं ही अपनी अज्ञानता को दूर करके सुखी होना होगा । जगत में जीवों का सहयोग करते हुए जीव दिखाई देते हैं वे अपने ही पूर्वकृत पुण्य के फल से सहयोग को प्राप्त होते हैं। साथी उसी को मिलते हैं जो स्वयं का साथी होता है इसलिए सद्गुणी होकर

स्वयं के साथी बनो !


● सुखी जीवों को देखकर यदि आपकी वेदना हो तो वह व्यक्ति स्वयं को कभी सुखी नहीं बता सकता । किन्तु किसी को सुखी देखकर छीना छपटी नहीं होनी न्याहिए, यही विवेक का मार्ग है।


● परछाई तभी तक रहती है जबतक धूप रहती हैं, धूप के साथ ही परछाई जाती है वैसे ही दूसरों का सामनभी तक है जब तक आपके पुण्य की धूप है। पुष्प के विदा होते ही आपके अपने साथी भी साथ छोड़ देते हैं अतः सद्गुरु कहते हैं स्वयं की छाया बनना शिखो ! 

रिपोर्ट-अनुज कुमार जैन

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