महामुनि का मनाया गया 107 वा आचार्य पदारोहण दिवस श्रेष्ठ समाधि साधक थे आचार्यश्री आदिसागर जी महामुनिराज !
● भावलिंगी संतश्राचार्य श्री विमर्श सागर जी महामुनिराज!
महमूदाबाद जन्म तो सभी का होता है किन्तु जन्म को जीवन करने वाले कोई विरले ही जीव हुआ करते हैं। आज के दिन एक ऐसे श्रेष्ठ साधक ने आचार्यपद लिया जिन्होंने स्वयं रत्नत्रयधर्म पालनकर जगत को भी सच्चे सुख का मार्ग दिखाया । उपर्युक्त भाव विनयांजलि प० पू० श्रमणाचार्य श्री विमर्शसागर जी महामुनिराज ने गुरु चरणों में समर्पित की । आचार्य श्री आगे बताया, आज से 156 वर्ष पहले सन् 1866 में महाराष्ट्र के अंकली गाँव में ऐसे महापुरुष ने जन्म लिया जो आगे जाकर बीसवी सदी के प्रथमाचार्य के नाम से प्रसिद्ध हुए, सन् 1913 में उन्होंने निर्ग्रन्थ दिगम्बर दीक्षा स्वीकार की और सन 1915 में नगर के कल्याणार्थ आचार्य पदग्रहण किया और सन् 1943 में महाशिवरात्रि को ही जन्म को भी जीवत करने वाला समाधि महोत्सव को प्राप्त किया। उनकी साधना बहुत कठोर थी
उनके समीप में ही आने से दुःखी प्राणी अपने दुःखों को दूर कर लेते थे, असाध्य रोग भी उनके स्पर्श मात्र से ठीक हो जाते थे। वे स्वयं ही दीक्षित हुए थे । निर्ग्रन्थ दीक्षा से पहले उनका नाम शिवगौडा था और सर्वप्रथम दीक्षा लेने से आपका नाम "आदिसागर" रखा गया जो आगे चलकर " चारित्र चक्रवर्ती मुनि कुंजर आचार्य श्री आदिसागर जी महामुनिराज" के नाम से प्रसिद्ध हुआ कार्यक्रम के दौरान संघस्थ साधुओं ने भी अपने श्रद्धा सुमन समर्पित किए । और सैकड़ों भक्तों ने भी भावना पूर्ण समर्पण अर्पित किया।
1.महामुनि सप्तह में एक बार आहार (भोजन ) करते थे।
2.महामुनि के दर्शनार्थ ब्रिटिश शासन द्वारा चलाई हज थी निशुल्क ट्रेन।
3.जंगल मे साधना करते हुए शेर सर्प आदि क्रूर पशु भी आपस मे शांति भाव से बैठे रहते थे।
रिपार्ट- अनुज कुमार जैन



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