भावालिंगी संत के पावन सानिध्य में ऐतिहासिक रूप से संपन्न हुआ "श्रुत पंचमी महापर्व "
कहो गर्व से हम जिनागम पंथी है ) भावलिंगी संत श्रमणाचार्य श्री विमर्श सागर जी मुनिराज महमूदाबाद सम्पूर्ण जैन समाज में हर्षोल्लास के साथ मनाया जाने वाला यह जिनवाणी पर्व अर्थात श्रुत पंचमी महापर्व अवध प्रान्त के महमूदाबाद नगर में अवस्थित श्री शान्तिनाथ जिनालय में परम पूज्य भागलिंगी संत श्रमणाचार्य श्री 108 विमर्शसागर जी महामुनिराज के पावन सानिध्य में एवं आचार्य वर्य के आशीर्वाद से सानन्द सम्पन्न हुआ । आचार्य श्री के संघस्य मुनिराजों के निर्देशन में सम्पन्न हुआ यह श्रुत पंचमी महापर्व नगरवासियों के हृदय पटल पर एक अमिट छाप छोड़कर इतिहास के पन्नों में दर्ज किया गया ।
आचार्य श्रेष्ठ श्री विमर्शसागर जी महामुनिराज के नगर आगमन से लेकर आज तक समाज के प्रत्येक व्यक्ति में एक ललक और अभूतपूर्व उत्साह निरंतर देखने को मिल रहा है। इस श्रुत पंचमी महापर्व पर आचार्य संघ के सानिध्य में समाज के प्रत्येक वर्ग की अनेको गतिविधियों से जोड़ा गया |
15 जून को प्रातः काल में निकलने वाली शोभा यात्रा की तैयारियां समाज के युवा वर्ग ने भरपूर श्रम परिश्रम करके यात्रा को बेहद रोचक और श्लाघनीय बनाया जिसकी भूरि-भूरि प्रशंसा गई। मंगल कामना से संहास्य ब्रह्मचारिणी बहनों के द्वारा मंगलाचरण किया गया । नजदीक के गाँव रामपुर-मथुरा से आए भक्तों ने आचार्य गुरुदेव श्री विमर्शसागर जी मुनिराज के भवना प्रहरी चरण कमलों का प्रछालन करके अपने सौभाया का वर्धन किया तथा नगर के महिलामण्डल द्वारा गुरुदेव के कर कमलों में जिनवाणी (शास्त्र) भेंट किया गया । तदानन्तर श्रुतपंचमी पर्व की पूजा करके आज का यह पर्व उल्लास पूर्वक मनाया / सभी श्रावक समुदाय के मध्य विराजे प० पूज्य आचार्य श्री का पर्व के अवसर पर मंगल प्रवचन हुए । भक्तों को मंगल उद्बोधन देते हुए गुरुदेव ने बताया - "आज का यह श्रुतपंचमी महापर्व सब पर्वो मे श्रेष्ठ है, अनादि काल में अविच्छिन्न रूप से चला आ रहा यह जैन धर्म जगत का कल्याण करने वाला है, संसार के दुःखो से छुड़ाकर सच्चे और शाश्वत सुख को प्रदान करने वाला है। समवशरण में भगवान तीर्थंकर के माध्यम से प्राप्त होने वाली दिव्यध्वनि आज के दिन लिपिबद्ध की गई । पूर्व आचार्यो की हम और आप पर महती कृपा रही जो उन्होंने हमारे लिए भगवान की अमृतमय वाणी को सहेजकर हम लोगों तक पहुंचाया, भगवान के द्वारा बताया गया मार्ग आज हमें जिनवाणी से ही प्राप्त होता है, वर्तमान में एक मात्र जिनवाणी ही भव्य जीवों के हित का मोक्ष का मार्ग प्रकाशित करने वाली है अतः हम सभी एक स्वर में कहते हैं -" जिनागम पंथ जयवंत हो " | "
प० पू० गुरुदेव के मंगल प्रवचन के पश्चात् 20 वीं सदी के प्रथमाचार्य चारित्र चक्रवर्ती आचार्य श्री आदिसागर जी महामुनिराज के 107 के आचार्य पदारोहण दिवस पर आचार्यदेव की महापूजा रचाई गई । संध्या बेला के द्वितीय सत्र में 06:30 बजे गुरु भक्ति की गई, पश्चात श्रुत पंचमी पर्व से संबंधित एक लघु नाटिका का नाट्यमंचन किया गया. फिर ज्ञानवर्धन हेतु सामूहिक प्रश्न मंच का कार्यक्रम सम्पन्न हुआ जिसमें सही जवाब देने वाले प्रतियोगी को पुरस्कार दिया गया। पिछले कई दिवसों से "शास्त्र सजाओ प्रतियोगिता को लेकर समाज के महिला-पुरुष, बालक-बालिकाओं में अभूतपूर्व उत्साह देखा गया, निर्णायक मण्डल द्वारा उनमें से प्रथम-द्वितीय तृतीय पुरुस्कार दिया तथा शेष लोगों को सांत्वना पुरुस्कार दिया गया । और अन्त में 60 प्रज्वलित दीप थालों से देवाधिदेव- जिनवाणी माता और निर्ग्रन्थ गुरुओं की नीलांजना उतारी गई । सभी गतिविधियों में आबाल वृद्ध सभी लोगों का अभूतपूर्व उत्साह देखने को मिला



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