श्री शांतिनाथ जिनालय में भावलिंगी संत के सानिध्य में की जाएगी श्रुत पंचमी पर्व की आराधना सब पर्वो का आधार है-श्रुत पंचमी महापर्व भावलिंगी संत श्रमणाचार्य गुरुदेव श्री 108 विमर्श सागर जी महामुनिराज !
महमूदाबाद ,सीतापुर
भारत देश अपनी संस्कृति और संस्कारों की दृष्टि से सम्पूर्ण विश्व में 'विश्वगुरू के नाम से जाना जाता है। प्रत्येक भारतीय नागरिक में भारतीय संस्कारों की झलक देखने को मिल जाया करती है। वर्ष भर के 365 दिनों में शायद ही कोई दिन ऐसा हो जिस दिन कोई पर्व त्योहार या कोई दिवस न हो, यहां हर दिन पर्व है, हर दिन त्यौहार है। आज 15 जून 2021- ज्येष शुक्ल पंचमी का दिन जैन धर्म में विशेष दिन माना जाता है, धार्मिक सिद्धांतों को जानने के लिए धर्म शास्त्रों का अध्ययन करना आवश्यक है।" जैन धर्म सबसे प्राचीन और अनादि काल से चलता आया शाश्वत और अविनश्वर धर्म है" यह बात जैन धर्म के धर्मग्रंथों से भली प्रकार जानी जाती है। प्राचीन काल में ज्ञान बुद्धि मनुष्यों में विकसित रूप से विद्यमान थी अतः शिष्यों को गुरु के द्वारा कराया गया अध्ययन मौखिक रूप से ही अवधारण कर लिया जाता था । धीरे-धीरे जब ज्ञान का क्षयोपशम हीनता को प्राप्त होने लगा तब प्राचीन जैनाचार्य मुनिराजों को इस बात की चिंता हुई कि अब आगे मनुष्यों का ज्ञान और अधिक हीन होता जाएगा अतः"अब अविछिन्न रूप से चली आ रही भगवान महावीर स्वामी की वाणी को लिपिबद्ध करना चाहिए।
इस विचार से गिरनार पर्वत की गुफाओं में साधनारत आचार्य देव ने दक्षिण देश में रहने रहने वाले निर्ग्रन्थ मुनिराजों को संदेश भिजवाया | तब दक्षिण देश में मुनिराजों का बड़ा विशाल सम्मेलन चल रहा था, ज्येष्ठ आचार्य भगवन्त ने दो सुयोग्य मुनिराजों को अपने पास से गिरनार देश की ओर भेजे । मुनिराजों के आने के पूर्व रात्रि के समय आचार्य देव ने स्वप्न देखा"समस्त लक्षणों से परिपूर्ण सफेद वर्ण वाले दो उन्नत बैल उनकी तीन प्रदक्षिणा देकर चरणों में पड़ गए हैं। स्वप्न से संतुष्ट हो आचार्य देव ने कहा "श्रुत देवता जयवंत हो । आचार्य देव श्री धरसेन स्वामी के चरणों में उपस्थित हुए दोनों मुनिराजों ने सविनय अपना निवेदन समर्पित किया, आचार्य देव ने दोनों सुयोग्य मुनिराजों की परीक्षा के बाद उन्हें अध्ययन कराना प्रारंभ किया । कुछ ही समय में अध्ययन पूर्ण होने पर देवों ने आकर उन सबकी पूजा की, तब आचार्य देव ने उनके पुष्पदंत और भूतबली ऐसे सार्थक नाम रखे । तदनन्तर गुरु की आज्ञा से दोनों मुनि राज अंकलेश्वर गुजरात में चातुर्मास हेतु गए। और दोनों ने ही शुरू से प्राप्त हुए ज्ञान को लिपिबद्ध करना प्रारंभ किया और आज ज्येष्ठ शुक्ल पंचमी के दिन उनको यह महान कार्य पूर्ण हुआ । 'शास्त्र (श्रुत) का लेखन आज पूर्ण हुआ इस प्रसन्नता से वहाँ उपस्थित श्रमण और श्रावकों ने श्रुत (शास्त्र) की बड़ी विशाल पूजा रचाई, तभी से यह पर्व "श्रुत पंचमी महापर्व" के रूप में सभी जैन धर्मानुयायी हर्बोत्साह के साथ मनाते आ रहे हैं।
आज 15 जून को महमूदाबाद के श्री शान्तिनाथ जिनालय में प. पू. आचार्य श्री विमर्श सागर जी महामुनिराज के पावन सानिध्य में मनाया जाएगा श्रुत पंचमी महा पर्व जिसमें जिनवाणी माँ की महाआराधना की जायेगी और साथ में मनाया जाएगा " 20 वीं सदी के प्रथमाचार्य आचार्य भगवन श्री आदिसागर जी महामुनिराज का 107 वाँ आचार्य पदारोहण दिवस । संध्या बेला में गुरु भक्ति, श्रुतपंचमी महापर्व पर प्रेरक लघु नाटिका, प्रश्नमंच, और आरती सजाओ प्रतियोगिता और फिर होगी 60 थालों से महा मांगलिक महाभारती !
रिपोर्ट-अनुज कुमार जैन


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