विकास शील और उन्नत जीवन को आलोकित करती भावलिंगी संत की दिव्य वाणी भावलिंगी संत ने कहा- जानें अपनी सत्यता, हम निवासी हैं या प्रवासी
"( देश और धर्म के लिए जियो)
" परम पूज्य भावलिंगी संत आदर्श महाकवि
गुरुदेव की यह देश-भक्ति परक प्रेरणादायी मौलिक रचना जिसे मध्यप्रदेश
शिक्षा बोर्ड कक्षा 11 वीं की मकरंद पुस्तक में शामिल किया गया है ऐसे श्रमणाचार्य श्री 108 विमर्श सागर जी महामुनिराज भगवान महावीर की वाणी को आत्मसात करते हुए महमूदाबाद में विराजमान हैं। पू. गुरुदेव के नगर आगमन दीर्घकालीन प्रवास में मात्र समाज में ही खुशी की लहर नहीं है अपितु सम्पूर्ण महमूदाबाद शहर तथा आसपास के क्षेत्रों में एक अभूतपूर्व खुशी की लहर दिखाई देती है और विशेष ज्ञातव्य बात यह है कि पूज्य गुरुदेव के महमूदाबाद प्रवास दौरान पूज्य श्री की साधना की प्रशस्त वर्गणाओं के आभामण्डल क्षेत्र में आने वाले सम्पूर्ण जैन समाज एवं सभी नगर वासी स्वास्थ्य की दृष्टि से भी सभी स्वस्थ हैं। आज श्रमणाचार्य श्री ने इस जीवन की सत्ता बताते हुए अपनी दिव्य देशना में कहा -
जिनवाणी में सबका हित निहित है, जिनवाणी मुक्ति का मार्ग दिखाती है । मुक्ति का अर्थ है दुःखों से छूटना, चिन्ताओं से छूटना अज्ञान पूर्ण विरोधाभासों से छूट जाना, और निज शान्ति की निकटता को प्राप्त करना । सभी जीव दुःख से मुक्ति चाहते हैं, सुख की प्राप्ति के लिए निरंतर उद्यमशील रहते हैं। साधन और संयोगों में सुख खोजते हैं। भगवान महावीर कहते हैं- सुख चाहिए तो बाहर नहीं निज घर में आओ, निजघर अर्थात निज शुद्धात्म । जो राग-द्वेष मोह आदि विभावों पर सवार होकर यात्रा करता है वह निज घर से दूर होता जाता है और जो वीतराग भावों का आश्रय करके यात्रा करता है वह निज घर को सच्चे सुख को प्राप्त करता
अपना घर छोड़के कहीं और न जाया जाये । अपने घर में ही नया बाग लगाया जाये ।
यह संसार एक किराये का घर है कोई भी भव्य जीव इस घर का निवासी नहीं है सभी जीव प्रवासी हैं भगवान महावीर निज आत्म घर को प्राप्त कर सिहालय के वासी हो गए हैं। ये हमसे भी कहते हैं- बेटा, तुम संसार के प्रवासी हो निवासी नहीं, अतः अपने निज शुहात्मा रूपी निज घर को प्राप्त होकर सिद्धालय के निवासी बनों
रिपोर्ट-अनुज कुमार जैन

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