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सीतापुर: कैसे करें जीवन में गुणों की अभिव्यक्ति !

 कैसे करें जीवन में गुणों की अभिव्यक्ति !


रिपोर्ट-अनुज कुमार जैन

महमूदाबाद, सीतापुर

● भावलिंगी संत श्रमणाचार्य श्री विमर्श सागर जी महामुनिराज




किसी ने पूछा गुरुदेव, प्रवचन में इतनी उत्तम उत्तम बातें सुनने को मिलती हैं, जीवन को अच्छा बनाने वाले सूत्र प्राप्त होते हैं, अनेक प्रकार के गुणों की चर्चा सुनने को मिलती है किन्तु फिर भी हम अपने को उस रूप क्यों नहीं बना पाते ? क्यों स्वयं को गुणों के साँचे में नहीं ढाल पाते ?



समाधान आपका प्रश्न सामयिक है । सद्गुरु के उपदेश सुनकर जीवन सद्गुण मय हो जाना चाहिए, क्योंकि हम इस भावना से ही तो सद्गुरु के वचन, उनकी वाणी को सुनते हैं। कुछ चीजें हम अपने हाथों से प्राप्त करते हैं, कुछ मुख से, कुछ आँखों से कुछ कानों से और कुछ चीजें हम पूरे शरीर से प्राप्त करते हैं। ये मन और इन्द्रियाँ हमें प्राप्ती का मार्ग हैं बशर्ते हम इनका उपयोग प्राप्ति के निमित्त से



सद्गुरु की वाणी हमें कर्णेन्द्रिय से प्राप्त होती है । ध्यान रखो - सुनना और प्राप्त करना दौनों अलग-अलग है । आप कैसा उद्देश्य लेकर बैठे हैं? यदि आप मात्र सुनने के लिए बैठे हैं तो आप वहीं तक सीमित रहेंगे, आपके जीवन में कोई रुपान्तरण नहीं होगा | किन्तु यदि आप प्राप्ति की भावना और उद्देश्य से बैठे हैं तो आपका उस दिशा में पुरुषार्थ होगा और आप निश्चित ही सफलता को प्राप्त होंगे । 

यह उद्देश्य आपके ज्ञान में होना चाहिए कि हम किस भावना से बैठे हैं। मान लीजिए आपने हाथ में थैला ले लिया है, जेब में पैसे भी रख लिए हैं और आप बाजार को चल दिए किन्तु आपको यह पता ही नहीं है कि मुझे बाजार से लाना क्या है तो सब कुछ उपलब्ध होते हुए भी आप रिक्त के रिक्त ही लौटकर वापस आ जायेंगे | ऐसा क्यों हुआ ? क्योंकि आपका उद्देश्य स्पष्ट नहीं है। आप स्वयं ही विचार करें- आप कितना उद्देश्य लेकर मंदिर में आते हैं कौनसा उद्देश्य लेकर सद्गुरू के पास आते हैं? कहीं ऐसा न हो कि आप मंदिर हो जायें किन्तु मात्र भगवान को देखकर लौर आयें, सद्गुरु के पास जायें तो मात्र उनकी वाणी सुनकर लौट आयें उनसे कुछ भी प्राप्त न कर पायें जैसे पहले रिक्त थे वैसे ही रिक्त रहें । तीर्थकर भगवान ? की वाणी में अनेक सूत्र आते हैं, एक सूत्र भी आपके जीवन को रूपान्तरित कर सकता है जैसे एक उद्देश्य से सोने का बिस्किट हार का रूप धारण कर लेता है ! आप धर्म तो कर रहें किन्तु मात्र क्रिया का धर्म कर रहे हैं हमें धर्म के स्वरूप गुणों की प्राप्ति रूप धर्म नहीं कर रहे इसी कारण आप इतने उपदेश सुनकर भी स्वयं में कोई परिवर्तन नहीं ला पाते ! अतः जीवन में गुणों की अभिव्यक्ति के लिए प्राप्ति करने का उद्देश्य बनाइये।


● आप स्वयं तो गुणों से प्रेम नहीं करते लेकिन सारी दुनियाँ को गुणवान देखना चाहते हैं ! आप अपने जीवन में एक गुण प्रकट कर लीजिए शेष गुण जीवन में आपोआप प्रकट हो जायेंगे जैसे एक बीज में ही पूरा वृक्ष छुपा रहता है ।

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