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सीतापुर: धर्म और धर्मात्माओं की रक्षा करने का संकल्प दिवस है रक्षाबंधन पर्व

धर्म और धर्मात्माओं की रक्षा करने का संकल्प दिवस है रक्षाबंधन पर्व ।

● भावलिंगी संत श्रमणाचार्य श्री विमर्शसागर जी महाराज 

- आपस में सूत्र बांधकर किया देव-शास्त्र शुरू की रक्षा का संकल्प |



रिपोर्ट-अनुज कुमार जैन


महमूदाबाद ,सीतापुर

जैन धर्म में बड़ी ही श्रद्धा-भक्ति और उत्साह से मनाया जाने वाला यह पर्व रक्षाबंधन पर्व है । 22 अगस्त रविवार को श्री 1008 शांतिनाथ जिनालय में परम पूज्य भावलिंगी संत श्रमणाचार्य श्री विमर्शसागर जी महामुनिराज के पावन सानिध्य में मनाया गया । पूज्य आचार्य श्री ने विशाल धर्मसभा के मध्य रक्षाबंधन पर्व कबसे और किस तरह प्रारंभ हुआ इसकी बड़े ही मार्मिक कथा सुनाई, जिसे सुनकर भक्तों के नयनों से अश्रुधारा बह निकली । उपदेश के उपरांत सभी श्रावकों ने आपस में एक दूसरे की कलाई पर रक्षासूत्र बांधकर धर्म और धर्मात्माओं की रक्षा करने का संकल्प दोहराया।



जैन मंदिर के निकट बजाजा बाजार में धर्मात्मा श्रावकों की लम्बी कतारें लगी दिखाई दीं । पूज्य आचार्यश्री संघ सहित आहार हेतु बाहर निकले तो एक एक परिवार एक-एक साधु-मुनिराज का पड़गाहन करके अपने घर ले गए और उनकी आहार विधि सम्पन्न कराई। पूज्य आचार्य श्री का आहार कोमलचंद परिवार में सम्पन्न हुआ। रक्षाबंधन पर्व के संदर्भ में अवगत कराते हुए पूज्य आचार्य ने कहा रक्षाबंधन पर्व सम्पूर्ण भारत वर्ष में एक पारिवारिक पर्व के रूप में मनाया जाता है किन्तु जैन धर्म में यह एक धार्मिक पर्व के रूप में विख्यात है । आज से हजारों वर्ष पूर्व जैन धर्म के 19 वें तीर्थंकर श्री 1008 मल्लिनाथ स्वामी के समय की एक घटना है- उज्जैनी नगरी के राजा श्री वर्मा बड़े धर्मात्मा थे। उनके चार मंत्री थे जो धर्म से द्वेष रखते थे। एक समय दिगम्बर मुनिराज आचार्य देव श्री अकंपन स्वामी 700 मुनिराजों के साथ उज्जैनी में पधारे, राजा ने मुनियों की चरण वंदना की किन्तु चारों मंत्री अन्यथा बातें बकते रहे और एक मुनिराज से शास्त्रार्थ करते हुए पराजित हो गए | द्वेष से भरे हुए वे मंत्री रात्रि के समय मुनि राज ऊपर उपसर्ग करने आए किन्तु जैसे ही उन्होंने तलवार से प्रहार किया तो तत्काल ही वे वनदेवता द्वारा कील दिए गए। प्रातः मुनिराज ने उन्हें अभयदान दिया फिर भी राजा के द्वारा उन्हें देश से निकाल दिया गया । वे चारों ही मंत्री हस्तिनापुर नगर में पहुंचे और चतुराई से राजा पद्म को प्रसन्न करके उनसे सात दिन तक राज सिंहासन को भोगने का वर मांगा, वचनबद्ध राजा को सात दिन के लिए राज्य छोड़ना पड़ा । राजा बनते ही चारों मंत्रियों ने द्वेषवश नगर में आए हुए आचार्य श्री अकम्पन स्वामी सहित 700 मुनिराजों पर घोर उपसर्ग करना प्रारंभ कर दिया उसने बाड़ी लगाकर उसमें आग लगा दी तथा पशुओं को होमा जाने लगा | इधर विक्रिया ऋद्धि के धारी मुनिवर विष्णु कुमार को यह समाचार ज्ञात हुआ तब वे एक बटुक ब्राह्मण का रूप धारण कर उन पापी मंत्रियों से दान लेने गए तथा दान में उन्होंने मात्र तीन पग भूमि माँगी, मंत्री के हाँ करते ही उन्होंने अपनी विक्रिया के द्वारा दो पग में ही सम्पूर्ण पृथ्वी नाप ली तथा तीसरे पग रखने के लिए स्थान पूछा तब बलि मंत्री बोला यह पग मेरी पीठ पर रख दीजिए | उन चारों मंत्रियों ने अपनी हार स्वीकार कर ली और जैन धर्म को स्वीकार किया । इस तरह मुनिवर विष्णुकुमार ने 700 मुनिराजों की रक्षा करके वात्सल्य धर्म निभाया । धर्मात्मा श्रावक एक- एक मुनिराज को घर ले गये को रक्षा सूत्र बाधकर धर्म और मुनिराज की रक्षा करने का संकल्प लिया तब से यह दिन रक्षाबंधन पर्व के नाम से जाना जाता है।



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